ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

मन की गहराइयों में



मन की 
गहराइयों में
इर्ष्या द्वेष के बादल
घनघोर बरस रहे हैं
प्रेम बार बार
मन का द्वार
 खटखटा रहा है
प्रवेश पाने में असफल
घबरा कर मन के
मुहाने से ही लौट रहा है
कब बादल विश्राम लें
मन में प्रेम बस जाए
प्रतीक्षा में व्याकुल है


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
 
07-06-2012
580-30-06-12

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें