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सोमवार, 6 अगस्त 2012

लूटने की तमन्ना में,खुद लुट जाते हो



शाम होते ही पंछी भी
चुग्गा दाना भूल जाते  
घरोंदों में लौट जाते 
रात भर विश्राम करते 
सवेरे तरोताजा उठते 
तुम जागते हो रात भर
सवेरे अलसाए उठते 
अधिक पाने की इच्छा में
थके मांदे जुट जाते हो 
न तन को आराम
न मन को विश्राम देते हो 
इच्छाओं के समंदर में
डूब जाते हो 
न हँसते हो न गाते हो 
भूल जाते हो जीवन में 
काम के अलावा भी 
बहुत कुछ चाहिए 
अंत तक चैन नहीं पाते हो
लूटने की तमन्ना में
खुद लुट जाते हो

06-06-2012
575-25-06-12

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