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मंगलवार, 7 अगस्त 2012

उन्होंने मुझे पुकारा

उन्होंने मुझे पुकारा मैंने भी मुस्कराकर
उनका अभिवादन किया पहले मिला नहीं आपसे
फिर भी बताइये
क्या काम है
तपाक से कह दिया वो पहले तो झेंपे
फिर मुस्काराकर बोले क्षमा करें गलतफहमी में
किसी और की जगह
आपको पुकार लिया अपना परिचय दिया पड़ोस की कॉलोनी में
रहते थे मेरे समकक्ष सरकारी
नौकर थे आज के समय में
जब जानने वालों से
रिश्ता निभाना कठिन
होता है गलतफहमी ने
हमारे बीच मित्रता का
मधुर रिश्ता बना दिया
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
06-06-2012
576-26-06-12

5 टिप्‍पणियां:

  1. हाँ ,होता है ऐसा भी -कभी संयोग से कभी संस्कारवश !

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  2. बहुत सुन्दर..आप की तरह निरंतर तो नही लिखती पर हाँ जो थोड़ा बहुत है उसमें आप का स्वागत है..

    उत्तर देंहटाएं
  3. ये रिश्ता यूँ ही कायम रहे ....

    उत्तर देंहटाएं