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शनिवार, 4 अगस्त 2012

खामोशी से सहना भी गुनाह होता



मुझे चोट लगी
मैं चुप रहा
मेरा दिल टूटा
मैंने कुछ नहीं कहा
मुझ पर पत्थर
फैंके गए
मैं हँसता रहा
मुझ पर इलज़ाम
लगाए गए
मैंने जवाब नहीं दिया
लोगों ने समझा
मैं गुनाहगार हूँ
पता नहीं था
खामोशी से सहना
भी गुनाह होता
इमानदारी से जीना
इतना दुश्वार होता
डा.राजेंद्र तेला,निरन्तर
05-06-2012
570-20-06-12

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