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शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

अब अपने आप से नफरत करने लगा हूँ


कभी कभी खुद से भी
नफरत होने लगती है
जो नहीं कहना चाहिए
कह देता हूँ
जो नहीं सुनना चाहिए
सुन लेता हूँ
दिल के हाथो कमज़ोर
हो जाता हूँ
खुद को बेबस पाता हूँ
सिला उम्मीद से
उलटा पाता हूँ
लोगों की नज़रों से
उतर जाता हूँ
अब सोच रहा हूँ
दिल की सुनना छोड़ दूं
दिमाग से काम लूं
चेहरे पर चेहरा चढ़ा लूं
हर बात को तोल कर बोलूँ
लोगों को खुश कर दूं
 झूठा सुकून दे दूं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
17-07-2012
610-07-07-12

3 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर शब्दों का प्रयोग ..
    मन की उथलपुथल को दर्शाती कविता

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. हाँ , लोग भी यही चाहते हैं !
    शुभकामनायें आपको !

    उत्तर देंहटाएं