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बुधवार, 15 अगस्त 2012

वटवृक्ष के सानिध्य में



आज फिर
व्यथित मन से
वटवृक्ष के नीचे आ
बैठा हूँ
सदा की तरह
सारी व्यथा रो रो कर
निकालूँगा
विशाल ह्रदय वाले
वटवृक्ष ने
सदा मौन रह कर
मेरी हर व्यथा को
धैर्य से सुना है
उसका मौन मेरे लिए
सदा ही
होंसला बढाने वाला
रहा है
मुझे विश्वास है
आज भी वही होगा
मेरे ह्रदय और मन को
चैन मिलेगा
वटवृक्ष अपना बड़प्पन
रखेगा
अपनी छाया में मुझे
हारने नहीं देगा
आज भी 
पहले से अधिक होंसले से
इसके सानिध्य से
उठ कर जाऊंगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
25-06-2012
591-41-06-12

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

    उत्तर देंहटाएं
  2. धैर्य और मौन ...और उसकी पीढा कभी कभी बहुत बढ़ जाती हैं ...

    उत्तर देंहटाएं