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मंगलवार, 14 अगस्त 2012

इच्छाओं की कस्तूरी



इच्छाओं की कस्तूरी
मनमोहिनी सुगंध से
मुझे निरंतर लुभाती
संतुष्टी के पथ से
डिगाने का
निष्फल प्रयत्न करती
मेरे संयम की बार बार
परीक्षा लेती
कभी मन करता
सब सूंघते कस्तूरी को
मैं क्यों पीछे रहूँ ?
प्रश्न मन का द्वार
खटखटाता
क्यों फिर कोई खुश नहीं?
उत्तर तो नहीं मिलता
स्वयं ही तय कर लेता हूँ
जब किसी ने भी
कामनाओं के संसार में
चैन नहीं पाया
सब इच्छाओं की कस्तूरी
सूंघ कर भी बेचैन हैं
मैं क्यों अपनी बेचैनी बढाऊँ?
जैसे हूँ वैसे ही खुश रहूँ
अधिक की कामना करे बिना
कर्म करता रहूँ
जो दिया इश्वर ने उसे
खुशी से स्वीकार करूँ
उसी ने दिया सब कुछ ,
वो चाहेगा तो
बिना मांगे ही दे देगा


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
25-06-2012
590-40-06-12

1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही बेहतरीन रचना...
    स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

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