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शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

श्रेष्ठ होने का अहम्

अकेला देख कर
आज सूनी पगडंडी भी
हँस रही थी
किनारे लगे पेड़
आश्चर्य से देख रहे थे
पेड़ पर बैठी कोयल भी
क्रोध में
जोर से कूंकने लगी
मानो सब अहसास
कराना चाहते थे
तुम्हारे बिना मेरा कोई
अस्तित्व नहीं है
भावना हीन
हाड़ मांस के पुतले से
अधिक नहीं हूँ
मात्र पुरुष होने के कारण
तुमसे श्रेष्ठ होने का
अहम् चूर चूर हो गया
मुझे सत्य का पता चल गया
पती पत्नी में ना कोई
श्रेष्ठ होता
ना ही निकृष्ट होता
एक में कमी की पूर्ती
दूसरा करता
अब लौट कर आ जाओ
मुझे प्रायश्चित करने में
सहयोग दो
तुम्हारे बिना वह भी
ठीक से नहीं कर पाऊंगा
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
29-05-2012
542-62-05-12

2 टिप्‍पणियां:

  1. ाजेंद्र तेला जी नमस्कार...
    आपके ब्लॉग 'निरंतर की कलम से' से कविता भास्कर भूमि में प्रकाशित किए जा रहे है। आज 22 जुलाई 'श्रेष्ठ होने का अहम' शीर्षक के कविता को प्रकाशित किया गया है। इसे पढऩे के लिए bhaskarbhumi.com में जाकर ई पेपर में पेज नं. 8 ब्लॉगरी में देख सकते है।
    धन्यवाद फीचर प्रभारी
    नीति श्रीवास्तव

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