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शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

आज किसी ने मुझे मेरे,बचपन के नाम से पुकारा ,

आज किसी ने  
बचपन के नाम से 

पुकारा मुझको
पीछे मुड कर देखा तो
एक बुजुर्ग सज्जन खड़े थे
मैंने कहा
पहचाना नहीं आपको
वो दुखी भाव से बोले
विश्वास नहीं होता
तुम इतना बदल जाओगे
तुम्हें स्कूल में पढाता था
मैं नहीं भूला तुमको
तुम कैसे भूल गए मुझको
क्या तुम भी ज़माने की
चाल चलने लगे हो
ऐसा तो कुछ नहीं
पढ़ाया था तुमको
मैं शर्म से गढ़ गया
तुरंत उन्हें प्रणाम किया
क्षमा मांगते हुए बोला
गुरूजी मैं तो पथ से
भटक गया था
पर बरसों बाद आपने
कैसे पहचान लिया
गुरूजी बोले
हर शिष्य को कलेजे का
टुकडा मानता रहा
अपना समझ पढ़ाता रहा
अब तुम्ही बताओ
कोई अपनों को
कैसे भूल सकता है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
09-05-2012
505-20-05-12


1 टिप्पणी:

  1. हर शिष्य को कलेजे का
    टुकडा समझता रहा
    तुम्ही बताओ
    कोई अपनों को कैसे
    भूल सकता
    बिल्‍कुल सही ... बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

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