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रविवार, 15 जुलाई 2012

आज कलम कुछ रुकी रुकी सी है


कुछ रुकी रुकी सी है
भावनाएं भी ठहरी हुयी हैं
रुकावटें मुंह बायें खडी हैं
चिंताएं बढ़ी हुयी हैं
कुछ लिखूं
या चिंताएं दूर करूँ
झंझावत में फंसी हुयी है
इधर कुआ उधर खाई है
लिखूं नहीं तो मन
तडपेगा
लिखूं तो समय
लिखने में लगेगा
जब तक चिंताओं को
झेलना होगा
अब फैसला कर लिया
लिख कर तनाव दूर
करूंगा
चिंताओं का बोझ
हल्का करूंगा
फिर ठन्डे दिमाग से
सोचूंगा
चिंता मुक्त होने का
मार्ग निकालूँगा

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
14-05-2012
523-43-05-12

8 टिप्‍पणियां:

  1. क्या बात है वाह!
    आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि दिनांक 16-07-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-942 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  2. अच्छी और सारगर्भित रचना |
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  3. कलम चला जब चाल से, हार गई तलवार।
    सबसे तीखी जगत में, शब्दों की है मार।।

    उत्तर देंहटाएं
  4. मन की चिंताए रोड़ा बनी, कलम लिखने को इन्कार
    जब तक मार्ग निकालता नही, करिये थोड़ा इन्तजार

    बहुत सुंदर प्रस्तुति,,,,

    RECENT POST...: राजनीति,तेरे रूप अनेक,...

    उत्तर देंहटाएं
  5. अब फैसला कर लिया
    लिख कर तनाव दूर
    करूंगा
    चिंताओं का बोझ
    हल्का करूंगा
    ......सच कहा आपने लिखकर कुछ तो मन हल्का होता ही है ..
    बहुत बढ़िया प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपकी कलम बस यूँ ही चलती रहे ...ये ही दुआ करते हैं

    उत्तर देंहटाएं
  7. kya likhu kya likhu kuchh bhi to baki na raha
    her taraf andhiyara ho gaya jag bhi ab nirala na raha........

    उत्तर देंहटाएं
  8. KYA LIKHU KYA LIKHU KUCHH BHI TO BAAKI NA RAHA
    HER TARAF ANDHIYARA JAG BHI AB NIRALA NA RAHA
    LOKHNE KO TO BAHUT HAI PAR AB MANN BHI TANHA NA RAHA

    उत्तर देंहटाएं