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सोमवार, 9 जुलाई 2012

लक्ष्य की और


कोई हाथ पकड़ता है
कोई पैर खींचता है
कोई बातों से विचलित
करने की कोशिश
तो कोई अवरोध खड़े
करता हैं
चारों तरफ से
मुझे पथ से डिगाने
का प्रयास होता रहा है
कभी विचलित भी होता हूँ
आपा खो देता हूँ
कभी लडखडाता हूँ
इश्वर में आस्था
अपने आप पर विश्वास
मुझे पथ से
डिगने नहीं देता
अवरोधों को पार करते हुए
लोगों के मंसूबे
पूरे नहीं होने देता
ना हार मानता हूँ
ना थकता हूँ
निराशा के चक्र व्यूह से
अपने को बचाते हुए
अविरल नदी सा बहता 
रहता हूँ
लक्ष्य की और
अग्रसर रहता हूँ
10-05-2012
511-26-05-12

4 टिप्‍पणियां:

  1. निराशा के चक्र व्यूह से
    अपने को बचाते हुए
    अविरल नदी सा बहता
    रहता हूँ
    लक्ष्य की और
    अग्रसर रहता हूँ....बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति..अभिव्यन्जना में आप का स्वागत है..

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार १०/७/१२ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चामंच पर की जायेगी आप सादर आमंत्रित हैं |

    उत्तर देंहटाएं
  3. एक -एक बात हकीकत लिखी है आपने...
    पर आपने आपको ऐसे में बचाना मुश्किल हो जाता है...
    पर बचाना तो होगा ही ,,वरना उनकी मनशा तो पूरी ही हो जाएगी..
    प्रेरनादायी रचना...
    :-)

    उत्तर देंहटाएं
  4. अवरोधों को पार करते हुए
    लोगों के मंसूबे
    पूरे नहीं होने देता
    ना हार मानता हूँ
    ना थकता हूँ

    सुंदर अभिव्यक्ति,,,,,

    बहुत दिनों बाद आपका पोस्ट पर आना हुआ,,,,,आभार

    उत्तर देंहटाएं