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रविवार, 1 जुलाई 2012

प्रेम का समुद्र


पानी की बूँद था,
अपने प्रेम से
तुमने उसे समुद्र
बनाया
अब तुम ही विछोह
चाहती हो
भाप जैसे उड़ा कर
आकाश में
मिलाना चाहती हो
मेरे अस्तित्व को ही
मिटाना चाहती हो
सृजक भी तुम
विध्वंसक भी तुम
यह कैसे हो सकता है ?
कितना भी प्रयत्न कर लो
सफल नहीं हो पाओगी
अब भावनाओं से
खेल नहीं सकती
अपने प्रेम को नफरत में
बदल नहीं पाओगी
इस तरह मिटा नहीं
पाओगी
मैं वर्षा के साथ पुनः
बूँद बन कर धरती पर
आ जाऊंगा
अपने प्रेम से तुम्हें
सरोबार कर दूंगा
तुम मजबूर हो कर
फिर मुझे समुद्र
बनाओगी
सदा के लिए मुझ में
समा जाओगी
तुम्हारा अस्तित्व
मुझ में समाहित होगा
चाहोगी तो भी मुझसे
अलग नहीं हो पाओगी
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
04-05-2012
494-09-05-12

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