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गुरुवार, 28 जून 2012

क्रोध पर कविता -मैं नहीं कहता तुम मेरी मानो


मैं नहीं कहता तुम
मेरी मानो
ध्यान से सुन तो लो
प्रतीत होता है
तुम्हें क्रोध बहुत आता है
आवेश में
जो नहीं कहना चाहिए
वो भी कह देते हो
एक बार गहनता से सोचो
तुम ऐसा करते हो या नहीं
आत्म मंथन करो ,
उत्तर मिल जाएगा
यही बात अगर 
कोई दूसरा तुम्हें कहे
कबकहाँ कहेगा?,पता नहीं
स्थितियों,परिस्थितियों का
ध्यान नहीं रखेगा
क्या तुम्हें अच्छा लगेगा ?
हो सकता है
व्यक्तियों के समूह में
तुम्हारा मखौल उड़ाया जाए
व्यक्तिगत 
संबंधों में दरार पड़ जाए
बात झगडे तक बढ़ जाए 
क्यों नहीं खुद इस बात को
समझ लो
एक बड़ी विपत्ती को
छोटे से सुधार से बचा लो
समय रहते क्रोध पर
काबू कर लो
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
02-05-2012
490-05-05-12

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