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शुक्रवार, 15 जून 2012

वक़्त गुजार रहे थे



वो ख्वाइशों के शज़र
लगाते रहे
हम निरंतर धन दौलत के
पानी से उन्हें सींचते रहे
वो फिर भी शिकायत
करते रहे
हमसे रुसवाई की धमकी
देते रहे
परेशाँ हो कर हमने खुद ही
मोहब्बत से
रिहा होने का फैसला
सुना दिया
बड़ी शिद्दत से
खुश हो कर वो कहने लगे
कौन कमबख्त
मोहब्बत करता था तुमसे
जाने से पहले
हमारी कामयाबी पर
मुबारकबाद देते जाना
हम तो खुद पीछा
छुडाने की
कोशिश कर रहे थे
जब तक
जुदा ना हो जाओ हमसे
तब तक
वक़्त गुजार रहे थे
17-04-2012
453-33-04-12
शज़र=पेड़ 

1 टिप्पणी:

  1. जितना कठोर घटनाक्रम था उस से भी अधिक सरलता से आपने उसे शब्दों में बाँध लिया...
    संवेदनाए कितनी सरल,स्पष्टअ और गहरी.,

    कुँवर जी,

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