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बुधवार, 27 जून 2012

क्यूं पहचानेगा कोई मुझे अब मेरे शहर में




कोई मुझे
अब मेरे शहर में
हो गया अनजाना अब
अपने ही शहर में
सोने चांदी से
भर गयी झोलियाँ सबकी
बन गए मकाँ बड़े बड़े
सीख गए चालें ज़माने की
अपनों को लात मार कर
आगे बढ़ने का हूनर भी
आ गया
मैं ईमान-ओ-दोस्ती के
गुमाँ में
वही खडा रह गया
नहीं कर सका बराबरी
उनकी
उनसे पीछे रह गया
क्यूं पहचानेगा कोई
मुझे अब मेरे शहर में
29-04-2012
483-64-04-12

1 टिप्पणी:

  1. मैं ईमान-ओ-दोस्ती के
    गुमाँ में
    वही खडा रह गया
    नहीं कर सका बराबरी,,,

    बहुत अच्छी प्रस्तुति,,,सुंदर रचना,,,,,

    MY RECENT POST काव्यान्जलि ...: बहुत बहुत आभार ,,

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