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गुरुवार, 28 जून 2012

पिंजरा



मैं खुद के बनाए
पिंजरे में 
बंद पंछी सा हूँ
जो पिंजरे की
जालियों के पार
देख तो सकता है
पिंजरे के
नियम कायदों से
मन में छटपटाहट
भी होती है
कई बार खुद को बेबस
महसूस करता हूँ
स्वछन्द उड़ना चाहता हूँ 
पर पिंजरे से
इतना मोह हो गया
कोई दरवाज़ा खोल भी दे
तो चाह कर भी
उड़ नहीं पाऊंगा

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
30-04-2012
485-66-04-12

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