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गुरुवार, 21 जून 2012

मन की कशमकश

सोचता रह जाता हूँ
मन की कशमकश
कह नहीं पाता
तुम भी सोचती रहती हो
कह नहीं पाती हो
हमारी खामोशी
बीच की दूरियां बढ़ा रही है
ना कहने की मजबूरियां
एक बड़े तूफ़ान का
साधन बन रही हैं
क्यों इस तरह भटक कर
स्थिति को
विस्फोटक बनाएं
ना जुड़ने वाले
रिश्ते की नीव रखें
क्यों ना थोड़ा सा
मैं आगे बढूँ
थोड़ा सा तुम आगे बढ़ो
अपनी कुंठाओं के
बाँध को तोड़ दें
एक दूसरे के प्रति पल रहे
अविश्वास के बादलों को
खुल कर बरसने दें
फिर से विश्वास
और प्रेम के
मार्ग पर चलने का
प्रयत्न करें
मन मष्तिष्क से
अहम्  के
बोझ को उतार फेंकें
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
                                 20-04-2012
                                       464-45-04-12

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