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शनिवार, 16 जून 2012

एक एक ईंट जोड़ कर बनाया था जो मकान मैंने




एक एक ईंट जोड़ कर
बनाया था जो मकान मैंने
बिना अपनों के
अब मुझे ही काटने को
दौड़ता है
जिसमें देखा था एक
सुखी परिवार के साथ
रहने का सपना
अब एक कैदखाने
सा लगता है
उसके बगीचे के फूलों में
महक नहीं  है 
तितलियाँ घर में
झांकती तक नहीं हैं 
वीरान जंगल में स्थित
उस मंदिर की तरह
जिसमें सब कुछ है
पर पूजने के लिए
कोई मूरत नहीं है
जहां दर्शन के लिए
कोई नहीं झांकता ,
है तो केवल
मेरे जैसा ही एक पुजारी
जो आशा से सामने
सड़क को देखता रहता
कभी कोई आयेगा
मंदिर में मूरत सजाएगा
दर्शानार्थी आने लगेंगे
घंटे बजने लगेंगे
फूल चढ़ने लगेंगे
पूरा मंदिर महकने लगेगा
परमात्मा का
बसेरा दिखेगा
ठीक उसी तरह मैं भी
आशा में जीवित हूँ
कभी मेरा भी घर बसेगा
परिवार बढेगा
बच्चों की किलकारियों से
घर गूंजेगा
बगीचे के फूलों पर
तितलियाँ मंडरायेंगी
मुझे लगेगा ईंटों में
जब तक ऐसा नहीं होता
मकान किसी वीरान
कैदखाने से
कम नहीं लगेगा
17-04-2012
453-34-04-12

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (17-06-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं
  2. हर दिल का अरमान ये ही ...कि वो रहे अपनों के बीच .

    उत्तर देंहटाएं