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बुधवार, 13 जून 2012

माँ की चिंता

(काव्यात्मक लघु कथा-माँ की चिंता)  

सर्दी की रात थी

घड़ी की सूइयां

बारह बजा रही थी

दोस्तों की महफ़िल सजी थी

माँ बेसब्री से

इंतज़ार करती होगी

जानते हुए भी

घर जाने की इच्छा ना हुयी

महफ़िल ख़त्म हुयी

घर पहुँच कर घंटी बजाई

माँ ने दरवाज़ा खोलने में

देर लगायी

देरी के लिए माँ को 

खरी खोटी सुनायी

माँ के चेहरे पर

शिकन नहीं आई

चुपचाप भोजन की

थाली लगायी

गर्म रोटी बना कर खिलायी

खाट पर जाकर लेट गयी

मुझे आवाज़ लगायी

एक दर्द की गोली दे दे

मुझे बात समझ नहीं आयी

माँ के सर पर हाथ रखा

सर बुखार से तप रहा था

मन ग्लानी से भर गया

अपने व्यवहार पर

क्रोध आने लगा

एक मैं हूँ जिसे

माँ की चिंता ही नहीं

दूसरी तरफ माँ है

जिसे मेरे सिवाय

किसी की चिंता नहीं

बरस बीत गए इस बात को

पर भूला नहीं हूँ

आज तक खुद को 

माफ़ नहीं कर पाया 

घटना को याद कर 

अब भी आँखें भीग जाती हैं

कितना भी प्रायश्चित कर लूं

ग्लानि कम नहीं होगी 

माँ की

बराबरी नहीं हो सकती 

माँ तो माँ होती

उसका सानी

ना कभी हुआ है कोई

ना हो सकता कोई कभी 

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  

17-04-2012

446-26-04-12

काव्यात्मक लघु कथा 


3 टिप्‍पणियां:

  1. सही कहा आपने
    हमारी वजह से माँ दुखी हो तो बहुत बुरा लगता है...
    माँ के प्रति अहसास बहुत अच्छा लगा..
    :-)

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी पोस्ट कल 14/6/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा - 902 :चर्चाकार-दिलबाग विर्क

    उत्तर देंहटाएं