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रविवार, 24 जून 2012

किसी की नज़र भी लगती किसी को



मानता नहीं था
किसी की नज़र भी
लगती किसी को
जब से वो रूठ गए
समझ आ गया
नज़र वाकई लगती 
अब उसको ढूंढ रहा हूँ
जिसकी नज़र लगी
हमारी मोहब्बत को
उसकी नज़र को ही
नज़र लगा दूं
जिसे तकलीफ
मेरे सुकून से
27-04-2012
472-53-04-12

9 टिप्‍पणियां:

  1. सच में लोगों को दूसरों की ख़ुशी और सुकून बर्दाश्त नहीं होता बुरी नजर तो असर करती ही है बढ़िया प्रस्तुति डा ,राजेंद्र तेला जी

    उत्तर देंहटाएं
  2. कुछ लोंगों को दूसरों की खुशियाँ बर्दास्त नही होती,,,,,,

    RECENT POST,,,,,काव्यान्जलि ...: आश्वासन,,,,,

    उत्तर देंहटाएं
  3. उमर लगने की दुनिया चाही थी, नजर लगाने लगी..

    उत्तर देंहटाएं
  4. क्या बात है!!
    आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि कल दिनांक 25-06-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-921 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुंदर.
    नजर लगा के चली गई वो नजर नजर ना आय

    उत्तर देंहटाएं