ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

गुरुवार, 17 मई 2012

लाचारी में



एक जोर की
किलकारी गूंजी
एक जान ने धरती पर
आँखें खोली
सड़क किनारे लेटी
माँ की आँखें खुशी से
नम हो गयी
अगले ही पल
खुशी हवा हो गयी
सोचने लगी
नन्ही सी जान को
कैसे खिलायेगी, 
पिलाएगी
अपना पेट भरना 
ही कठिन
इसकी भूख कैसे मिटाएगी
कैसे हवस के भूखे
भेड़ियों से
इसकी अस्मत बचायेगी
विचारों ने पथ
चेहरे ने रंगत बदली
लाचारी में खुद से 
कहने लगी
जो होगा देखा जाएगा
जैसे मैं अब तक जी 
रही हूँ
वैसे ही ये भी जी लेगी
जो इसकी
किस्मत में लिखा होगा
भुगत लेगी
अभी तो इसका पेट
भर दूं
जो मेरे हाथ में है 
वह तो कर दूं
फिर दूध पिलाने लगी

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
17-03-2012
392-126-03-12

2 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन क्रम थक कर चलता है,
    सड़कों में पत्थर पलता है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. जीवन चक्र का एक ये भी रंग हैं ...माँ की ये ही सोच रहती हौं अपने बच्चो के लिए ..

    उत्तर देंहटाएं