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सोमवार, 28 मई 2012

थोड़ा तुम आगे बढ़ो,थोड़ा मैं आगे बढूँ



मैं रात में  देर से सोता
तुम कहती लाईट में
नींद नहीं होती
तुम भरती जोर के खर्राटे
नींद मेरी भी उडती
तुम पीती चाय ठंडी 
मुझे गर्म चाय अच्छी
लगती
मुझे पसंद मीठा
तुम्हें नमकीन पसंद
तुम्हें व्यायाम अच्छा
लगता
मुझे खेलना भाता
मैं पंखे बिना सो ना पाता
तुम्हें पंखे में जुखाम हो
जाता
मैं चलाता पंखा
तुम उसे बंद कर देती
मैं सुनता समाचार टी वी पर
तुम देखती सीरिअल
तुरंत चैनल बदल देती
बड़ी अजीब हालत है
किच किच ख़त्म नहीं होती
घर घर यही कहानी है
जो एक को पसंद
वो दूजे को नापसंद
क्या करें
या तो हर दिन
हर बात पर झगडें
या बीच का रास्ता निकालें
आओ अब अहम् को
छोड़ दें
थोड़ा तुम आगे बढ़ो
थोड़ा मैं आगे बढूँ
एक दूजे की पसंद का
ख्याल कर लें
थोड़ा तुम्हारी पसंद का
थोड़ी मेरी पसंद का कर लें
जितना भी साथ जीना
उतना खुशी से जी लें


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 
20-03-2012
416-150-03-12

4 टिप्‍पणियां:

  1. आओ अब अहम् को
    छोड़ दें
    थोड़ा तुम आगे बढ़ो
    थोड़ा मैं आगे बढूँ
    एक दूजे की पसंद का
    ख्याल कर लें

    इसी थोड़े-थोड़े से प्रयास से जीवन में स्वर्ग का आनंद मिलता है.. वरना तो हम सब अहम् के गर्त में ही गुज़ार देते हैं.. सुन्दर शब्दोने के साथ सार्थक सन्देश देती रचना.
    सादर,
    मधुरेश

    उत्तर देंहटाएं
  2. मध्यमार्गी पंथ ही स्वीकार हो..

    उत्तर देंहटाएं
  3. सही विश्लेषण ...कहानी घर घर की

    उत्तर देंहटाएं