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सोमवार, 14 मई 2012

बोगेनवेलिया


बोगेनवेलिया
तुम्हारे पुष्प तो बहुत
सुन्दर होते हैं
लाल पीले सफ़ेद नारंगी
और भी कई रंगों के
दूर से ही लुभाते हैं
पास जाता हूँ
तो उन्हें सुगंधहीन
पाता हूँ
सोचता हूँ क्या हुआ
अगर सुगंधहीन है
एक गुच्छा तोड़ कर
फूलदान में ही लगा दूं
नयनों को
सुख प्रदान कर दूं
गुच्छा तोड़ने के लिए
हाथ बढाता हूँ ,
बेल का काँटा बेरहमी से
मेरे अंगूठे में चुभता है
पीड़ा से सहर उठता हूँ
मन में विचार आता है
ऐसे सुगंधहीन
पुष्प का क्या करूँ
जिसे फूलदान में भी
नहीं लगा सकता हूँ
विचार बदलता हूँ
कोई बात नहीं
तुम्हारे पुष्प नयनों को
सुख प्रदान करते हैं
वही बहुत है
उन लोगों से तो अच्छे हैं
जो दुःख के
सिवाय कुछ नहीं देते
इर्ष्या द्वेष से जीते हैं 

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
16-03-2012
385-119-03-12

5 टिप्‍पणियां:

  1. हां...कुछ लोग होते ही हैं जो बिना दुःख दिए मानते ही नहीं हैं ....

    उत्तर देंहटाएं
  2. आज तक तो लोग राजनीगंधा, गुलाब, चम्पा, चमेली, जाने किन- किन फूलों पर लिखते आए हैं मगर आज आपने इन बोगन बेलिया पर कमाल का लिखा है वाकई यह फूल घर में भले ही न साजये जा सकते हो मगर आँखों को सुकून बहुत देते हैं। सार्थक रचना आभार ...

    उत्तर देंहटाएं