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मंगलवार, 29 मई 2012

कभी बहते पानी सा होता था


कभी बहते
पानी सा होता था
मस्ती में
डूबा रहता था
जब से तुम्हें देखा
तालाब के पानी सा
ठहर गया हूँ
तुम्हारे ख्यालों में 
खोया रहता हूँ 
हर लम्हा इंतज़ार
करता हूँ 
तालाब की दीवारें 
कब टूटेगी 
कब मोहब्बत की 
धारा में
तुम्हारे साथ बहायेगी 
तुम्हारी ज़िन्दगी के
समंदर में मिलाएगी  
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
20-03-2012
417-151-03-12

3 टिप्‍पणियां:

  1. जब से तुम्हें देखा
    तालाब के पानी सा
    ठहर गया हूँ

    वाह अद्भुत पंक्तियाँ हैं...बधाई

    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  2. वो इस कदर मुझमें उतर गया....दि‍ल एक कमरा बना और वो रौशनी सा भर गया....वाह..

    उत्तर देंहटाएं