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गुरुवार, 24 मई 2012

हास्य कविता-खिली धूप बरसात के बाद-(मित्रता समाप्त करना चाहें तो मित्रों को अवश्य सुनाएं)



खिली धूप
बरसात के बाद
मुस्कान आयी होठों पर
बरसों की उदासी के बाद
दिखा चेहरा तुम्हारा
चेहरा खुद का
सैकड़ों बार शीशे में
देखने के बाद
समझते थे खुद को जोकर
छुपाते थे चेहरा अपना
तुम्हें देखने से पहले
अब जान गए
असलियत खुद की
तुम्हें देखने के  बाद
तुम लगते हो जोकर
हम लगते सिकंदर
ये जान गए आज
18-03-2012
408-142-03-12
(मित्रता समाप्त करना चाहें तो मित्रों को अवश्य सुनाएं)

2 टिप्‍पणियां: