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शुक्रवार, 18 मई 2012

प्रकृती और पर्यावरण से मज़ाक कब बंद होगा





चेहरे पर तनाव लिए
खामोशी से सब
अपनी परेशानियों से
झूझ रहे
आधी उम्र में पूरा दिख रहे 
किसी को फ़िक्र नहीं
हवा में धुएं का ज़हर बढ़ रहा
खोल कर देखो तो फेफड़े
काले हो गए
सीमेंट कंक्रीट का जंगल
महामारी की तरह अपने
पाँव पसार रहा
शहर बीमार सा लडखडाते
पैरों से चल रहा
बीमारी को विकास
समझ रहा
 संक्रमित पानी को पी कर
मिलावट से युक्त भोजन कर के
भोजन कर के
अपने को भाग्यशाली
समझ रहा
रोज़ सैकड़ों नयी जानें
धरती पर जन्म ले रही
उनकी किलकारी गूंजते ही
घरों में खुशियाँ मनती
मानों सब कह रहे हैं
आओ तुम्हारा स्वागत है
इस विकसित दुनिया में
अब तक हम भुगत रहे थे
अब तुम भी भुगतो
तभी एक जान
दुनिया से कूच करती
लोग दुःख मनाते
शायद मन में कहते हो
इसका तो पीछा छूट गया
इस विकास और विकसित
होने की लालसा से     
जाने हमारा पीछा
कब छूटेगा
प्रकृती और पर्यावरण से
मज़ाक कब बंद होगा  
17-03-2012
393-127-03-12

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    लिंक आपका है यहीं, मगर आपको खोजना पड़ेगा!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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