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रविवार, 13 मई 2012

वृद्धावस्था पर कविता-खोखली हँसी


वृद्धावस्था पर कविता
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पुरानी तसवीरें देखता हूँ
सोच में डूब जाता हूँ
उन हँसते हुए चेहरों को 
आसपास ढूंढता हूँ
कुछ चेहरे नहीं दिखते
काल के गाल में समा गए
पर अधिकतर दिख जाते
चेहरे वही पर अब चिंताग्रस्त
झुर्रियां लिए हुए 
ह्रदय में बुढापे का दर्द छुपाये
खोखली हंसी से मेरा 
स्वागत करते हैं
मानों मेरा मज़ाक उड़ा 
रहे हैं
मुझ से चीख चीख कर 
कह रहे हैं 
हमें क्या देखते हो
अपने चेहरे को भी शीशे 
में देखो
तुम्हारा चेहरा भी
हमारे चेहरे जैसा ही 
दिखता है
बुढापे का चेहरा
कल क्या होगा ?
के सोच में डूबा हुआ
आज की पीड़ा से ग्रस्त
सम्मान,भाईचारे,अपनत्व को
तलाशता हुआ
उसे पता ही नहीं है
अब इनकी आशा करना 
व्यर्थ है
जितना भी मिल रहा है
उसी में संतुष्ट रहो
जैसा भी जीवन मिले जी लो
अधिक की आशा करोगे
समय से पहले चले जाओगे
जब तक जीवित हो
खोखली हँसी ही हँस लो 

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
15-03-2012
380-114-03-12

1 टिप्पणी:

  1. कल ,आज और कल .....ये ही नियम हैं इस परिवर्तनशील जीवन का

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