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बुधवार, 9 मई 2012

हम हार क्या गए


हम हार क्या गए
अब रोज़ आने लगे हैं
दिल दुखाने वाले
गलतियां निकालने वाले
क्या करना चाहिए था ?
क्या नहीं करना
चाहिए था ?
समझाने वाले
जब तक जीतते थे हर
 लड़ायी
हम से बेहतर नहीं
होता था कोई
अब हम नासमझ
हो गए
समझदार हो गए
पीछे पीछे चलने वाले
एक अहसान कर गए 
चेहरे पर चढ़ा 
चेहरा दिखा गए 
आ.राजेंद्र तेला,निरंतर
13-03-2012
364-98-03-12

3 टिप्‍पणियां:

  1. जब तक जीतते थे हर
    लड़ायी
    हम से बेहतर नहीं
    होता था कोई
    अब हम नासमझ
    हो गए.............Behot khoob..

    उत्तर देंहटाएं
  2. हारे को हरी नाम...बहुत अच्छी रचना है आपकी...बधाई

    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  3. ''हार''...अपने आप में पूर्ण शब्द हैं ....इस जिंदगी का सबसे बड़ा दर्द ....

    उत्तर देंहटाएं