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शनिवार, 5 मई 2012

सब्र के कपडे पहन लें ,मन में सहनशीलता ओढ़ लें


तुम कहो मैं सुनूँ 
जैसा चाहो वैसा करूँ
 मानूं नहीं तो
 तुम रूठ जाओ
फिर मैं तुम्हें मनाऊँ 
मैं कहूं तुम सुनो 
जो चाहूँ वो करो 
नहीं करो तो मैं रूठ जाऊं
फिर तुम मुझे मनाओ 
दोनों यूँ ही 
रूठते मनाते रहेंगे 
आपस में 
लड़ते झगड़ते रहेंगे 
जीवन यूँ ही काटते रहेंगे
ना नें खुश रहूँगा 
ना तुम खुश रहोगे
क्यों ना 
थोड़ा सा खुद को 
बदल लें
रूठने मनाने की 
आवश्यकता ना पड़े
दोनों सब्र के कपडे 
पहन लें
मन में सहनशीलता 
ओढ़ लें
कुछ मेरा कुछ तुम्हारे 
मन का कर लें
जीवन काटने के जगह 
खुशी से जी लें 
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
12-03-2012
353-87-03-12

5 टिप्‍पणियां:

  1. रूठने मनाने में न....कहीं बीत जाए जिंदगानी। अच्‍छी रचना..

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    लिंक आपका है यहीं, मगर आपको खोजना पड़ेगा!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर राजेंद्र जी ... :)

    उत्तर देंहटाएं
  4. रूठने मनाने की
    आवश्यकता ना पड़े
    दोनों सब्र के कपडे
    पहन लें
    मन में सहनशीलता
    ओढ़ लें
    कुछ मेरा कुछ तुम्हारे
    मन का कर लें
    बहुत सुन्दर विकल्प

    उत्तर देंहटाएं
  5. दोनों सब्र के कपडे
    पहन लें
    मन में सहनशीलता
    ओढ़ लें

    इतना हो जाये तो कितना अच्छा हो...!

    उत्तर देंहटाएं