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शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

संगत में कुछ तो सीख जाऊंगा


खुश हूँ कोई तो
जानने लगा है मुझको
ठीक से 
हचानने लगा है मुझको
जो भी कहता हूँ
ध्यान से सुनता है
चुप रहकर सर हिलाता है
हाँ में हाँ मिलाता है
शायद वो भी वही
सह रहा है
जो मैं सह रहा हूँ
वही भुगत रहा है
जो में भुगत रहा हूँ
वो चुप रहना सीख गया
मैं अब भी
एक ही गीत गाता हूँ
अपने दुखो का रोना रोता हूँ
उनका बाज़ार लगाता हूँ
जानता हूँ
कोई खरीददार नहीं
मिलेगा
खुद का युद्ध
खुद को ही लड़ना पड़ता  
खुद को ही चुप रह कर
सहना  सीखना होगा
वो सहना सीख गया
मुझे सीखना बाकी है
इसी आशा मैं
उससे निरंतर मिलता हूँ
संगत में कुछ तो सीख
जाऊंगा
मन की कुंठाओं पर
एक दिन विजय
पा लूंगा
04-03-2012
291-26-03-12

4 टिप्‍पणियां:

  1. मन की कुंठाओं पर
    एक दिन विजय
    पा लूंगा
    आभार उत्‍कृष्‍ट रचना के लिए ..

    उत्तर देंहटाएं
  2. खुद का युद्ध
    खुद को ही लड़ना पड़ता
    खुद को ही चुप रह कर
    सहना सीखना होगा

    बहुत गहरी बात....सरल शब्दों में कविता के माध्यम से कह दी है आपने...बधाई स्वीकारें

    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी बात कोई सुन तो रहा हैं ...मान भी रहा हैं .....ये तो अच्छी बात हैं ना....आप अपने जीवन की छोटी छोटी बातों को यहाँ लिखते हैं सरल शब्दों में .....सच में कमाल हैं डॉ

    उत्तर देंहटाएं