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सोमवार, 2 अप्रैल 2012

उसकी रज़ा को सर झुका कर कबूल कर लूं


लौट कर आता नहीं
वक़्त जो बीत  गया
क्यूं दुखाऊँ
दिल को याद कर के
उस मंजर को जो
गुजर गया
ना जाने कितने गम
बचे हैं
ज़िन्दगी में सहने
के लिए
कितना भी बचना चाहूँ
बच ना सकूंगा
अभी बहुत है
खुदा की झोली में
मुझे देने के लिए
क्यूं ना उनके लिए
तैयार रहूँ
खुदा के फैसले का
खामोशी से इंतज़ार करूँ
उसकी रज़ा को
सर झुका कर कबूल
कर लूं
02-03-2012
277-12-03-12

7 टिप्‍पणियां:

  1. सच है..बीता वक्त लौट कर नही आता..जो है उसे ही कबूल किया जाए.. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति..

    उत्तर देंहटाएं
  2. haan sach hai beetaaa waqt aata nahi dobara to kyon na use sahajtaa se sweekaar kar lein. sandeshprad rachna, badhai.

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुंदर रचना...ख़ुदा की रज़ा ही होती है जब हिलता है एक भी पत्ता ....

    उत्तर देंहटाएं
  4. एक और अच्छी प्रस्तुति |
    ध्यान दिलाती पोस्ट |
    सुन्दर प्रस्तुति...बधाई
    दिनेश पारीक
    मेरी एक नई मेरा बचपन
    http://vangaydinesh.blogspot.in/
    http://dineshpareek19.blogspot.in/

    उत्तर देंहटाएं
  5. "अभी बहुत है
    खुदा की झोली में
    मुझे देने के लिए
    क्यूं ना उनके लिए'

    कबूल.... कबूल....कबूल....
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति..

    उत्तर देंहटाएं
  6. सच हैं जी .....गया वक्त कभी नहीं आता

    उत्तर देंहटाएं