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बुधवार, 18 अप्रैल 2012

मन नहीं लगेगा मेरे कमरे की दीवारों का

मन नहीं लगेगा
मेरे कमरे की दीवारों का
मेरे दुनिया से जाने के बाद 
निरंतर मुझे याद करेगी
जब उन्हें रहना पडेगा 
तन्हायी में
कुछ कह तो नहीं पाएंगी
मगर मुझे याद कर के
कुछ सोचेंगी अवश्य 
आंसू तो नहीं बहायेंगी
मगर घर में 
सूनापन तो लायेंगी
दीवारों के रंग
हलके लगने लगेंगे
खामोशी काटने को दौड़ेगी
जब भी मेरी कुर्सी पर 
कोई बैठेगा
मेरी कलम से कुछ
लिखने की कोशिश करेगा
पसंद नहीं करेंगी
मेरे कमरे की दीवारें
मेरे जाने के बाद
अगर खेला किसी ने
मेरे ज़ज्बातों से
मेरे दुनिया से जाने के बाद 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

07-03-2012

316-50-03-12

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना.....

    उत्तर देंहटाएं
  2. खामोशी
    काटने को दौड़ेगी
    जब भी
    मेरी कुर्सी पर कोई
    बैठेगा........sahi kaha aapne ...par kisi ko aana hai to doosre ko aana hai yahi jeevan ka saccha samna hai

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी रचना पढकर अजीब सी कसक हुई मन में, मृत्यु तो सत्य है पर जीवन भी उतना ही सत्य, परन्तु क्या जाने हमारे जाने के बाद हमारे घर की दीवारें जो निर्जीव है क्या सोचे... उतना ही दुखी हों जितना कोई अपना... मार्मिक रचना, बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  4. bahut khoob sir....पसंद नहीं करेंगी
    मेरे कमरे की दीवारें ...sty baat hum unse apne se jyada jud jaate hain jb se wah humari baaten sunne lagti hain..

    उत्तर देंहटाएं
  5. Ghar apnaa he..diwaaren apni he...apanaa pan to jataayegi.......good poem liked very much...thanks..

    2012/4/19 "निरंतर" की कलम से...

    उत्तर देंहटाएं
  6. मौत ही सत्य हैं ......मौत के बाद क्या होगा ..कौन जानता हैं?

    उत्तर देंहटाएं