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गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

अब बचा नहीं कुछ बताने को


लुटा चुका सब
कुछ बचा नहीं
अब लुटाने को
इतना कुछ देख लिया
बचा नहीं अब
कुछ और देखने को
इतना रो लिया अब तक
मन नहीं करता
अब हँसने का
जी रहा हूँ किस तरह
अब बचा नहीं कुछ
बताने को
सुकून क्या होता है
भूल गया हूँ
समझता हूँ  सुकून
अब चुप रहने को
03-03-2012
287-22-03-12

3 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी रचना....
    लेकिन कुछ ज्यादा निराशावादी लग रही है....
    बचें.....!!

    उत्तर देंहटाएं
  2. सर्वाधिक हल्कापन तभी लगता है, शून्य से।

    उत्तर देंहटाएं
  3. इतना रो लिया अब तक
    मन नहीं करता
    अब हँसने का
    जी रहा हूँ किस तरह
    अब बचा नहीं कुछ
    बताने को
    कुछ ज्यादा ही नैराश्य से भरी कविता .
    कहना चाहूँगा -
    बहुत मुकाम बाकी हैं,अभी ज़िन्दगी में मेरे दोस्त,
    एक मुहबत्त के टूटे कोई फलक नहीं टूट जाता,
    हर रात के बाद एक सहर भी जरूर होती है,
    एक नाखुशी के साथ,खुशियों का किनारा तो नहीं आ जाता

    उत्तर देंहटाएं