ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

रविवार, 1 अप्रैल 2012

गर्मी की दोपहर का क़र्ज़


गर्मी की दोपहर में
हम दोनों
बस स्टॉप पर खड़े थे
कुछ देर तक
एक दूसरे को
कनखियों से देखते रहे
प्यास के मारे
उसका गला सूख रहा था
पसीना बह रहा था
कुछ देर बाद परेशान हो
धीमी आवाज़ में बोली
बहुत गर्मी है ,
प्यास भी लग रही है
बस का पता नहीं कब
आयेगी
मैंने अपना रुमाल
पानी की बोतल
उसकी तरफ बढ़ा दी
उसने मेरी तरफ देखा
फिर मुस्कारा कर
धन्यवाद कहा
जब से अब तक वो
मेरे साथ है
निरंतर मेरी प्यास
बुझाती है
काम से थका मांदा
घर आता हूँ
पसीना पोंछती है
गर्मी की
उस दोपहर का क़र्ज़
अब तक चुका
रही है
02-03-2012
273-08-03-12

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...
    आपकी यह प्रविष्टि कल दिनांक 2-04-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर लिंक की जा रही है। सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  2. भला हो उसका जो एक बोतल पानी के बदले निरंतर गंगा जल का प्रतिदान बन रही है ....... बहुत सुन्दर जी /

    उत्तर देंहटाएं
  3. vaah to aapka milan busstop se shuru hua....kuch yaaden jindagi bhar saath rahti hain.bahut khoob.

    उत्तर देंहटाएं
  4. mooldhan se itna jyada byaj...yah rachna dil ko choo gayee..aaj to aap kee jitni tarif kee jaaye kam hai...sadar badhayee aaur amantran ke sath

    उत्तर देंहटाएं
  5. उत्तर
    1. रचनाजी,
      आपकी जिज्ञासा उचित है
      मेरी तो नहीं
      पर किसी की तो है

      हटाएं