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रविवार, 11 मार्च 2012

जो भी मन चाहता था ...


बूढा शरीर अस्वस्थ
पीड़ा से त्रस्त
दर्द के मारे
बैठा नहीं जा रहा था
पर आँखों में चमक
मन खुश
ह्रदय गदगद था
दर्द का
अहसास ही नहीं था
कई दिनों के बाद
पुत्र का पत्र आया
कानों ने
कर्णप्रिय संगीत सुना
महक से भरपूर
फूल बगीचे में खिला
रंग बिरंगी सुन्दर
चिड़िया को देखा
जो भी मन चाहता था
उसे मिल गया
था
19-02-2012
194-105-02-12

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....
    शुभकामनाएँ

    उत्तर देंहटाएं
  2. पिता पत्र से ही खुश हो जाता है ...यह बात पुत्र को कहाँ समझ आती है ....

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुन्दर....

    बुढापे में इतनी सी खुशी भी रोशनियाँ भर देती है...

    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  4. sahi kaha aapne sunder post kai baat sirf khat ya baccho ki awaj hi trupti aur khushi de jati hai . yahi to sahara hoti hai jeevan ke is padav ki .

    उत्तर देंहटाएं