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रविवार, 25 मार्च 2012

बेचारी अटेची


मुझे यात्रा में
काम आने वाली अटेची
पर बहुत दया आती
अमीर गरीब
हर घर में मिलती 
देश विदेश
सब जगह साथ निभाती
यात्रा पर जाना होता
तो सबसे प्रिय बन जाती
झाड पोंछ कर साफ़
करी जाती 
पसंद के सामान से
सजायी जाती
ट्रेन हो या हवाई जहाज
सदा वो ही मस्तिष्क में रहती
ओझल ना हो जाए
दृष्टी बार बार उसी पर जाती
यात्रा पूरी ना हो जाए जब तक
ह्रदय में निवास करती
एक बार लौट कर आ जाओ
तो सौतेले व्यवहार का
शिकार होती
मूक रह कर सहती रहती
सामान निकाल कर
पलंग के नीचे
अलमारी के ऊपर
या भुखारी में छुपा दी जाती
यात्रा में लगाए नाम की
चिप्पियाँ तक
उतारी नहीं जाती 
महीनों धूल खाती रहती
किसे ऐसे रिश्तेदार जैसे होती
जिसे विवाह के अवसर पर
शान बढाने के लिए
बुलाया जाता
विवाह संपन्न होते ही
भुला दिया जाता 
24-02-2012
237-148-02-12

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...
    आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 26-03-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  2. mujhe nahi lagta ke samay per itna kaam aanewaali, aur utni hi upekshit hone wali Ataichi ke baare mein kisi aur ne issey pehle kavita likhne ke baare mein socha hoga, us intkhaab/soch ke liye hats-off Nirantarji, saral shabdon mein ek sundar kavita

    उत्तर देंहटाएं
  3. किसे ऐसे रिश्तेदार जैसे होती
    जिसे विवाह के अवसर पर
    शान बढाने के लिए
    बुलाया जाता

    वाह! बहुत बढ़िया
    सादर।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बाह जी क्या कमाल की अटैची है !

    उत्तर देंहटाएं
  5. Wastaw me aapne yaad dililaya to samjh me aaya...bilkul saty aur umda rachna. thanks

    उत्तर देंहटाएं
  6. ओझल ना हो जाए
    दृष्टी बार बार उसी पर जाती
    good, its true.

    उत्तर देंहटाएं