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शुक्रवार, 30 मार्च 2012

अपेक्षाओं के समुद्र में


अपेक्षाओं के समुद्र में
गोता लगाना छोड़ दो
जितनी गहरायी में
जाओगे
गंद साथ लाओगे
अपेक्षाओं की थाह
फिर भी कभी ना
पाओगे
मन की व्यथा बढाओगे
चैन अपना खोओगे
रिश्तों से हाथ धोओगे
पाना हैं चैन जीवन में
अपेक्षा रखना छोड़ दो
इच्छाओं को कम करो
निरंतर
संतुष्ट
रहना सीख लो
अपेक्षाओं के समुद्र में
गोता लगाना छोड़ दो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
01-03-2012
271-06-03-12

4 टिप्‍पणियां:

  1. अपेक्षाओं के समुद्र में प्यास बढ़ती ही जाती है, कम तो होती ही नहीं है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. icchaoun ko kam kar khud ko santusht rakhne ki prerna deti aapki kavita sacch mein acchi lagi , keep it up Nirantar ji

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बढ़िया....

    पाने से अधिक देने में संतोष है....
    सादर.

    उत्तर देंहटाएं