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शुक्रवार, 2 मार्च 2012

आंसू भी सूख जाते हैं



लोग इस हद तक 
दुखी हो जाते हैं 
रोना तक भूल जाते हैं 
आंसू भी सूख जाते हैं 
हँसने  का
तो सवाल ही नहीं
हर लम्हा
सहते सहते कटता है 
जीना भी
मुश्किल हो जाता है 
खामोशी से यादों के 
सहारे ज़िंदा रहते हैं 
मौत का इंतज़ार में
डूबे रहते हैं 
क्यूं आये थे संसार में
निरंतर सोचते रहते हैं 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

14-02-2012
171-82-02-12

5 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन भाव पूर्ण सार्थक रचना, शुभकामनाएँ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. मंज़र खामोशी का हम भी देखते हैं ......

    उत्तर देंहटाएं
  3. "हर लम्हा
    सहते सहते कटता
    जीना भी
    मुश्किल हो जाता"

    "अब जीना इतना मुश्किल भी नहीं....
    जीवन का नजरिया बदलिए....
    सुख मिले या दुःख....
    ख़ुशी ख़ुशी स्वीकार कीजिये..."

    उत्तर देंहटाएं