ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

मंगलवार, 20 मार्च 2012

समझ नहीं आता क्या करूँ?


समझ नहीं आता
क्या करूँ?
कैसे मन की बात कहूं?
क्या लोक लाज को
छोड़ दूं?
सीमाओं को तोड़ दूं
शहर में उसे आम करूँ
खुद की हँसी उड्वाऊँ  
या चुप रह कर
घुटता रहूँ
मकडी के जाले जैसी
कुंठाओं में उलझा रहूँ
बुरी तरह जकड़ा रहूँ
दिन रात तडपता रहूँ
उन्हें और पनपने दूं
या सब्र से काम लूं
वक़्त गुजरने का
इंतज़ार करूँ
परमात्मा पर छोड़ दूं
वो ही रास्ता निकालेगा
उम्मीद में जीता रहूँ
23-02-2012
224-135-02-12

8 टिप्‍पणियां:

  1. raah apne -aap ban jati hai ....kuda ki marji bhi saath chalti hai ....usi ki kalam jeevan ke rang bharti hai ..........

    उत्तर देंहटाएं
  2. अनुपम भाव संयोजन लिए उत्‍कृष्‍ट लेखन
    कल 21/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.

    आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!


    ... मुझे विश्‍वास है ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. मौन को तुम यूँ न तोड़ो -
    स्वयं पे विश्वास करो
    मौन स्वर बन स्फुटित होगा
    वक़्त पे ऐतबार करो

    उत्तर देंहटाएं