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सोमवार, 19 मार्च 2012

चैन की मरीचिका



चैन अब मरीचिका
समान हो गया
सामने दिखने लगता
आशा में दौड़ने लगता हूँ
मिलने से पहले ही
कोई व्यवधान बीच में
आ जाता
आँखों से ओझल
हो जाता
मिलते मिलते
हाथ से फिसल जाता है
निराशा मन में
घर बनाने लगती
कोई चाहने वाला मिल
जाता
होंसला बढाता
अपने को सम्हालता हूँ
हिम्मत जुटाता हूँ
चैन की आकांशा में
फिर चलने लगता हूँ
सामने देखता हूँ
चैन फिर दिखने लगता
चेहरा आशा से चमकने
लगता
परन्तु वही कहानी
फिर दोहराई जाती
आस पास देखता हूँ 
तो कोई साथ नहीं
दिखता
मुरझाये चेहरा लिए
थक कर बैठ जाता हूँ
पर हारा नहीं हूँ
देखता हूँ कब तक इश्वर
मेरी परीक्षा लेगा
निरंतर
सोचता हूँ चैन भ्रम है
किस को मिला है
जो मुझे मिलेगा
फिर सोच आता
चैन ही सब कुछ है
चैन पाने की आशा कम
नहीं होती
स्वयं पर से विशवास
नहीं खोता हूँ
फिर परमात्मा से
प्रार्थना करने लगता हूँ 
कोई आयेगा
फिर से होंसला बढ़ाएगा
इक दिन तो
चैन मिल ही जाएगा

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
22-02-2012
222-133-02-12

8 टिप्‍पणियां:

  1. आशा का दामन कभी नही त्यागना चाहिये।

    उत्तर देंहटाएं
  2. स्वयं पर से विशवास
    नहीं खोता हूँ
    फिर परमात्मा से
    प्रार्थना करने लगता हूँ
    कोई आयेगा
    फिर से होंसला बढ़ाएगा
    इक दिन तो
    चैन मिल ही जाएगा

    जिसने आशा और विश्‍वास रखा ..
    सफलता उसी के हाथ आयी !!

    उत्तर देंहटाएं
  3. चैन अवश्य मिलेगा...

    अच्छी रचना.
    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  4. चैन को खोजने में जीवन चला जाता है, बैठ कर सुस्ता ले प्यारे।

    उत्तर देंहटाएं