ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

बुधवार, 7 मार्च 2012

क्या यही उसका न्याय है ?


सांयकाल का समय
गाँव के कौने में बनी
फूस की झोंपड़ी
गोबर से लिपा फर्श
दो चार खाली बर्तन
खाने को कुछ भी नहीं
भूख से व्याकुल बूढ़ी माँ
उदिग्नता से पुत्र की
प्रतीक्षा कर रही थी
उसका एकमात्र सहारा
काम से लौटेगा
खाने के लिए कुछ लाएगा
उसने सुबह से कुछ नहीं
खाया था
केवल पानी पी कर
काम चलाया था
आँखों में आशा के भाव
स्पष्ट झलक रहे थे
दूर धूल उड़ने लगी
कुछ आवाजें सुनायी
पड़ने लगी
उदिग्नता कम होने लगी
लोगों के
पास आने पर देखा
पुत्र अकेला नहीं आया था
उसके मृत शरीर के साथ
कुछ लोग भी थे
जिन्होंने बताया
दुर्घटना का शिकार हो
काल कवलित हो गया था
बूढ़ी माँ
चुपचाप देखती,सुनती रही
आँखों से अश्रुओं की धारा
बह निकली
निढाल हो कर लुडक पडी
पुत्र के पास परलोक
पहुँच गयी
आँखें आकाश को देखती हुयी
खुली की खुली ही रह गयी
मानों परमात्मा से
पूंछ रहीं हो
क्या यही उसका
न्याय है ?  
17-02-2012
181-92-02-12

6 टिप्‍पणियां:

  1. रश्मि प्रभा... said...
    ईश्वर के आगे भी सारे उत्तर धुंधले होते हैं , जब उसे प्रयोजन हेतु किसी को ले जाना होता है और वह भी रोता ही है
    February 17, 2012 11:57 AM

    उत्तर देंहटाएं
  2. कुछ सवालों के उत्तर ईश्वर के पास भी नहीं होते......
    मार्मिक रचना...
    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी कविता ने इस बार भी निशब्द कर दिया
    बेहद मार्मिक रचना ..........एक तरफ तो सबको होली की शुभकानाएं दे रहे हैं
    और यहाँ आ कर दर्द भरी पाती पढ़ने को मिली ...

    उत्तर देंहटाएं