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मंगलवार, 6 मार्च 2012

क्यूं नहीं साफ़ साफ़ कहते ...

मेरे लबों पर
तुम्हारे लबों के निशाँ
अब भी ताज़ा हैं
मेरे गालों पर तुम्हारी
ऊंगलियों का अहसास 
अब भी होता है 
तुम्हारा हर अंदाज़
मेरे जहन में ज़ज्ब है
मेरे दिल में अब भी 
तुम्हारा ही बसेरा है
मेरी यादों का
दूसरा नाम भी तुम हो
फिर भी तुम कहती हो
तुम्हें भूल जाऊं
क्यूं नहीं
साफ़ साफ़ कहती हो 
खुद को ही भूल जाऊं
इस फरेबी दुनिया से
कोई वास्ता ही ना रखूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
शायरी,मोहब्बत
16-02-2012
177-88-02-12

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    रंगों की बहार!
    छींटे और बौछार!!
    फुहार ही फुहार!!!
    होली का नमस्कार!
    रंगों के पर्व होलिकोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ!!!!

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति....
    होली की हार्दिक शुभकामनाएँ।
    फ्री ग्रीटिँग्स भेजने के लिए http://indiadarpan.blogspot.com पर विजिट करेँ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. दर्द भरी अभिव्यक्ति...
    सुन्दर.

    आपकी होली शुभ हो...

    उत्तर देंहटाएं