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शुक्रवार, 2 मार्च 2012

क्या सोचता होगा साज़?


क्या सोचता होगा साज़?
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क्या सोचता होगा साज़?
जब खेलती नहीं ऊँगलिया उससे
बजाता नहीं कई दिनों तक उसे कोई 
निकालता नहीं सुर नया कोई
पौंछता नहीं जमी हुयी धूल कोई
पूँछता होगा सवाल खुद से
जवाब नहीं मिलता होगा कोई
उसी तरह बजता है निकालता है सुर वही
कई दिनों के बाद जब छेड़ता है उसे कोई
क्यों व्यथित हो जाता है मन
कई दिनों तक जब मिलता नहीं
हमें अपना कोई
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
14-02-2012
170-81-02-12

4 टिप्‍पणियां:

  1. ***Punam*** said...

    कई दिनों के बाद जब
    छेड़ता है उसे कोई
    क्यों व्यथित
    हो जाता है मन
    कई दिनों तक जब
    मिलता नहीं हमें
    अपना कोई!

    beautiful......

    उत्तर देंहटाएं
  2. Nikalta hae sur wahi,
    kae dino ke bad jab
    chherta hae use koe
    KHOOBSURAT KAVITA

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुंदर अभिव्यक्ति अच्छे भाव की रचना,....

    NEW POST ...काव्यान्जलि ...होली में...

    उत्तर देंहटाएं
  4. अपनों के बिन कहाँ बजता है मन का साज..

    उत्तर देंहटाएं