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बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

मसीहा

दर्द हद से
गुजरने लगा
आखों से
आंसू बहाने लगा
हालात से लड़ना
मुश्किल हो गया
दिन के उजाले में
अन्धेरा छा गया
खुद को अकेला
समझने लगा 
तभी ज़िन्दगी में
खुदा ने एक
अजनबी को भेजा
उसने आँखों के 
आंसू पौंछे
ज़ख्मों पर मरहम
लगाया
होंसला बढाया
ज़हन में छाये
अँधेरे कोहटाया
जीने का अर्थ
समझाया
खिजा सी 
ज़िन्दगी को
बागे बहार में 
बदला
वो अजनबी नहीं
एक मसीहा है
मेरे लिए
10-02-2012
139-50-02-12

2 टिप्‍पणियां:

  1. जो आपके आँसुओं को अपने कंधों पर ले ले, वह तो मसीहा ही हुआ..

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