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रविवार, 26 फ़रवरी 2012

भोलापन (हास्य कविता)


आग दिलों में
लगी हुयी थी
निगाहें उनकी भी
तिरछी थी 
निगाहें मेरी भी
तिरछी थी
ना वो मेरी सूरत
ठीक से देख सकी
ना मैं  उनकी सूरत
ठीक से देख सका
नज़र से नज़र
ना मिल सकी
अधूरी मुलाकातें
यूँ चलती रहीं
दिल की हसरत
पूरी नहीं हुयी 
इत्तफाकन 
मुलाक़ात हो गयी
तो बड़े
भोलेपन से बोली
भाई जान
आपकी सूरत
जानी पहचानी
सी दिखती
12-02-2012
157-68-02-12

2 टिप्‍पणियां:

  1. जय हो, कम से कम बेगानी तो नहीं लगती है..

    उत्तर देंहटाएं
  2. हंसने का मौका मिला आपकी कविता पढ़कर..:)

    उत्तर देंहटाएं