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सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

कुछ लम्हों के लिए

जब परेशां होता हूँ
उजाला भी 
काटने को दौड़ता है 
अन्धेरा 
अच्छा लगने लगता है 
मन करता है 
आँखें बंद कर
किसी कौने में दुबक
जाऊं 
कोई चेहरा
नज़र नहीं आये 
हर शख्श ,हर बात को
भूल जाऊं
बचपन की यादों में
लौट जाऊं
कुछ लम्हों के लिए
ही सही
फिर से हँसने लगूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
04-02-2012
107-17-02-12

9 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर की गई है। चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

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  2. परेशानी में तन्हा रह कर खुद में खोना ही अच्छा लगता है ... इसे आपने सटीक शब्द दिये हैं ॥

    उत्तर देंहटाएं
  3. सही कहा है..ऐसा ही मन चाहता है..

    उत्तर देंहटाएं
  4. एकदम सही बात है
    बहुत बेहतरीन रचना है :-)

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत ही अच्छा.....ये बावला मन न जाने क्या क्या चाहता है |

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  6. बचपन की यादो के साथ ...जीवन मधुर बन जाता हैं ...

    उत्तर देंहटाएं
  7. बचपन की यादें कहाँ भूल पाते हैं...बहुत सुंदर

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  8. SUNDAR BHAV SUNDAR RACHNA GUSTAKHI KARTE HUE KAHNA CHAHOONGA-
    ANDHERON KI TANHAIE ME YADO KA SAFAR,KUCH ALAG SUHANA LAGTA HAI
    KAHNA CHAH KAR CHHAHE KAH NA SAKE,NAHI TO BADA VEERANA LAGTA HAI

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