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शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

लगती है आग जब पानी में


लगती है आग जब
पानी में
किनारा भी महफूज़
नहीं रहता 
मोहब्बत की आग
जब जलाती है दिल को
कोई सहारा उसे बचा
नहीं पाता
यादें सोने नहीं देती 
अकेलापन
तिल तिल कर मारने
लगता
आँखों से अश्कों की
बरसात नहीं रुकती  
मिलने की ख्वाइश
मरने नहीं देती
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
08-02-2012
124-35-02-12

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