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सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

निश्छल प्रेम


नदी का
निर्मल शीतल जल
समुद्र के प्रेम में मग्न
अविरल बहते हुए
समुद्र से मिलने
चल देता
कोई पथ से रोके
अवरोधक बने
अपने
पथ से डिगता नहीं
निरंतर नया पथ
बनाता
सहनशीलता संजोये
बिना व्यथित हुए
अपने लक्ष्य की ओर
अग्रसर होता रहता
समुद्र की गोद में
समा कर
लक्ष्य प्राप्त करता
अपने
निश्छल प्रेम को
पा लेता
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
09-02-2012
134-45-02-12  

9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    ओम् नमः शिवाय!
    महाशिवरात्रि की शुभकामनाएँ!

    उत्तर देंहटाएं
  2. गहन दार्शनिक अंदाज़ ... सुंदर प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच
    पर की गई है। चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

    उत्तर देंहटाएं
  4. लहराती सी नदी चली है, सागर में मिल जाने को...

    उत्तर देंहटाएं
  5. नदी मिलती है सागर में अवरोधों को नकार कर !
    खूबसूरत भावाभिव्यक्ति !

    उत्तर देंहटाएं
  6. bahut sunadr rachna hai Dr. saahab,charcha manch par dekhi to aaye bina nahi rha gaya...bdhaai aap ko

    उत्तर देंहटाएं