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रविवार, 26 फ़रवरी 2012

अच्छा हुआ जो फूल के रूप में पैदा नहीं हुआ


बचपन से ही
फूल मुझे बहुत पसंद हैं
पर पहले सोचता था
कितना अच्छा भाग्य होता
फूलों का
हर आदमी उन्हें चाहता
उनकी सुगंध से
मदमस्त हो जाता
इश्वर को
या अन्य  किसी को भी
सम्मान रूप भेंट किया जाता 
मन में सवाल आता
इश्वर ने फूल के रूप में
क्यों जन्म नहीं दिया
क्यों मुझे इंसान बनाया
अब सोचता हूँ
इंसान के रूप में ही ठीक हूँ
अच्छा हुआ जो फूल के रूप में
पैदा नहीं हुआ
जो भी खूबसूरत फूल खिलता
भंवरों से बच भी जाए
किसी ना किसी हाथ द्वारा
नोंच लिया जाता
माला बनाने के लिए सुई से
बींध दिया जाता
समारोह पूरा होते ही
फैंक दिया जाता
पैरों तले  रौंद दिया जाता
मौत आने से पहले ही
कई बार मार दिया जाता
सुन्दर दिखना और महकना ही
काफी नहीं होता
कष्ट में जीवन जीना पड़े चाहे
पर परमात्मा से
बुलावा आने पर ही
सम्मान पूर्वक
संसार से जाना चाहता
किसी के हाथों बेरहमी से
कुचला और मारा नहीं
जाना चाहता 
12-02-2012
155-66-02-12

4 टिप्‍पणियां:

  1. ह्म्म्म....
    कभी कभी इंसान को भी तो असमय जाना पड़ता है...कष्ट भोगना पड़ता है...

    उत्तर देंहटाएं
  2. फूलों के दर्द और तकलीफ को खूबसूरत ढंग से उभारा है.. बहुत सुन्दर !

    उत्तर देंहटाएं
  3. सौन्दर्य को यही मिलता है, जंगलियों के बीच..

    उत्तर देंहटाएं