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मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

लम्हों का अहसास

रेस्तरां के
कोने में पडी मेज़
मेरी मुन्तजिर थी
रेस्तरां में कदम रखते ही
उम्मीद से मेरी तरफ
देखने लगती
वो मेरे साथ होंगी
मेज़ पर आ बैठेंगे
आँखों में आँखें डाल
घंटों एक दूसरे को
देखते रहेंगे
एक दूसरे की साँसों में
खुशबू घोलेंगे
कई वादे करेंगे
दिल नहीं मानेगा
फिर भी दोबारा
मिलने के लिए बिछड़ेंगे
उसे पता नहीं
अब वो दुनिया से
कूच कर गए
जाते जाते अपना
पता भी नहीं छोड़ गए
नहीं तो मेज की
ख्वाइश
उन तक पहुंचा देता
उसे ख्याल नहीं था
मैं अपनी यादों के
हँसी लम्हों का
अहसास करने के लिए
कौने में पडी मेज़ को
देखने के लिए
रेस्तरां में आता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

31-01-2012
89-89-01-12

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